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स्वतंत्रता दिवस कुंभलगढ़, जवाई और रणकपुर में...
उदयपुर बाइक एक्सपीडिशन(भाग 2)
आज 15 अगस्त था तो सुबह स्विमिंग पूल में ही ग्रुप देशभक्ति से सराबोर था।खूब नाचे और देश की आन बान शान तिरंगे के साथ खूब फोटो लिए।
यहां कुंभलगढ़ से जवई लगभग 90 किलोमीटर था।रास्ता बहुत ही खूबसूरत था और पूरे रास्ते राम देवरा जाने वालों की अपार भीड़।सच असली यात्रा तो ये लोग ही कर रहे थे।रास्ते में जहां जहां नदी, तालाब थे वहां इनके रात्रि ठिए आबाद थे, सुबह उठे वहीं नहाए और चल दिए।रास्ते भर राम रसोई जिंदाबाद जहां चाय नाश्ते से भोजन तक सब कुछ इनके लिए सहज उपलब्ध था।ना कोई होटल ना कोई रेस्टोरेंट का झंझट बस प्रकृति का आनंद लेते जाओ रास्ते में जो भी दर्शनीय स्थल हो पूरे अनुशासन से लाइन में रहते हुए उसके दर्शन करते चले जाओ।सच में यही लोग हैं जो भारत में यात्रा की संस्कृति और संस्कार को जिंदा रखे हुए हैं।सर सहज ही झुक झुक जा रहा था इन यात्रियों की जिजीविषा देख कर🙏
बहुत ही खूबसूरत रास्ते की खास बात थी सड़क के दोनों ओर बड़ी तादाद में लगे नीम के झाड़, कुछ बरगद और पीपल के झाड़।जहां सैकड़ों वर्ष पुराने नीम थे तो नया प्लांटेशन भी नीम का ही था।पता नहीं हमारे प्रदेश के नीति नियंता नीम पीपल बरगद से क्यों मुंह मोड़े हुए हैं।
रास्ते में सादड़ी में रुके तो चाय के लिए थे पर प्याज की कचोरी गरम गरम उतर रही थी तो बस फिर क्या था अब कचोरी की है तो कुछ मीठा, फिर कुछ लिक्विड कुल मिलाकर अच्छे खासे आइटम इंदौरियों ने मिलकर सूत दिए।
जवई पहुंचे तो 6 फोर व्हील ड्राइव जिप्सी जीपें सफारी के लिए हमारा इंतजार कर रही थी।अभी तक जितनी सफारी दुनिया भर में की थी वे या तो जंगल में थी या रेत में।पर जवई की सफारी इन सबसे अलग थी।बड़ी बड़ी विशाल चट्टानों वाले पहाड़ पर ये गाड़ियां चढ़ और उतर रही थी।पहाड़ी ड्राइव का यह अनुभव बहुत ही रोमांचकारी रहा।पहाड़ी के टॉप पर पहुंचकर पूरे क्षेत्र को निहारना और फोटो सेशन करना यादगार अनुभव रहा।यहां से पुनः रोमांचक ड्राइव करते हुए हम जवाई बांध के बैकवाटर की ओर बढ़े जहां बताते हैं कि कई मगरमच्छ भी रहते हैं।पूरी सफारी में हमें तेंदुए तो नहीं दिखे पर पहाड़ों पर खतरनाक तरीके से चढ़ने उतरने में मजा आ गया।अगर ड्राइवर को कुछ अलग से भेंट पूजा की जाए और जीप में सवार सभी लोग मजबूत दिल वाले हों तो ड्राइवर सफारी को और अधिक रोमांचक और एडवेंचरस बना देते हैं। यहां सफारी का यह अलग सा अनुभव एक बार लेने लायक है। यही कारण है कि यहां देखते देखते 200-250 होटल रिसोर्ट बन गए हैं। 5000 रुपए से लेकर 3 लाख रुपए प्रतिदिन चार्ज करने वाले।यह तय रहा कि जवाई एक बार और आया जाएगा और यहां रुककर सुबह शाम की दोनों सफारी का आनंद लिया जाएगा।
वापस आए तो बस और कार के ड्राइवर भोजन करने निकल गए थे।भरी गर्मी और उमस में भी लगभग आधा घंटा बगैर कोई शिकवा शिकायत के सब अंताक्षरी खेलते रहे और समय व्यतीत किए, यही बातें विजयंत ग्रुप की यात्राओं को यादगार और शानदार बनाती है।शिकायत नहीं जैसी जो भी परिस्थिति हो उसका आनंद लेना, सलाम सभी साथियों की इस जिजीविषा को🙏
लगभग 40 किलोमीटर चलकर हम पहुंचे प्रसिद्ध जैन तीर्थ रणकपुर में।लगभग 1 घंटे मंदिर परिसर में रहे और इस विशाल मंदिर को देखा और भगवान के दर्शनों का लाभ लिया।यहां के पुजारी जी ने लगभग 15 मिनट तक इस मंदिर का इतिहास और विशेषताओं से हम सभी को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि 600 वर्षों पुराने इस मंदिर में 1444 खंभे खड़े हैं।यह परिसर लगभग 40000 वर्ग फीट में फैला है। करीब 600 वर्ष पूर्व 1446 विक्रम संवत में इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ था जो 50 वर्षों से अधिक समय तक चला। इसके निर्माण में करीब 99 लाख सोने की मोहरें खर्च की गई थी। मंदिर में चार कलात्मक प्रवेश द्वार हैं। मंदिर के मुख्य गृह में तीर्थंकर आदिनाथ की संगमरमर से बनी चार विशाल मूर्तियाँ हैं।नलिंगुलम विमान या दिव्य वाहन के आकार में निर्मित, इस मंदिर की वास्तुकला वाकई में दर्शनीय है।
यहां से 40 किलोमीटर था हमारा कुंभलगढ़ का रिसोर्ट।अबकी बार जो रास्ता हमने पकड़ा वह लगभग पूरा का पूरा घाट सेक्शन था।मौसम मस्त हो रहा था और घने जंगलों, विशाल वादियों और पहाड़ों के बीच इस मौसम में बाइकिंग का आनंद बहुत ही शानदार और यादगार अनुभव रहा।आत्मा तृप्त हो गई इस सफर में।
इस सफर में हुई दो घटनाएं भी हमेशा याद रहेंगी।
हुआ यह कि प्रताप की मोटरसाइकिल पंचर हुई तो उन्होंने अपने पीछे बैठे प्रमोद को उतारा और चढ़ाई पर 2 किलोमीटर आगे एक गांव की ओर अकेले बाइक को चलाते हुए पंचर बनवाने निकल गए।प्रमोद भाई भारत भाई की बाइक पर बैठकर आगे 1 किलोमीटर आए वहां हम सभी एक दूसरे का इंतजार कर रहे थे।वहां आए कुछ फोटो खिंचवाए तो उन्हें याद आया कि उनका और प्रताप का मोबाइल तो रास्ते में गिर गया है।भारत भाई उनको लेकर फिर नीचे उतरे तीन किलोमीटर तक देखा पर मोबाइल नहीं मिले वापसी में 2.5 किलोमीटर के बाद अचानक किनारे पर पड़े मोबाइल दिख गए और वो ले आए।इतने ट्रैफिक में सड़क पर पड़े मोबाइल 1 घंटे तक सुरक्षित रहे यही सोच सोचकर हम सभी आश्चर्यचकित थे।कल भी भारत भाई का मोबाइल कुंभलगढ़ जवाई के रास्ते में गिर गया था जो किसी किसान को मिला और फोन लगाने पर उसने बताया कि मेरे गांव आ जाओ मोबाईल सुरक्षित है।याने भारत भाई दो दिनों में तीन मोबाइल ढूंढकर ले आए।
1 किलोमीटर ऊपर गांव में पहुंचे जहां प्रताप पंचर बनवा रहा था।वहां चाय पीते पीते जगदीश भाई से मुलाकात हुई जो वाल्वो बस के ड्राइवर है और यही पास में एक गांव में रहते हैं।पुत्र की आस में उन्होंने सात लड़कियां की और आठवें बच्चे के रूप में पुत्र प्राप्त किया।सबसे बड़ी बच्ची को डाक्टर बना चुके हैं और बाकी सब को भी पढ़ा रहे है।उनकी जिजीविषा को भी प्रणाम किया।
अंधेरा होते होते हम कुंभलगढ़ पहुंच चुके थे।बस और कार करीब 1 घंटे बाद आई।आज भोजन करके कैम्प फायर का विधिवत आयोजन किया।कैम्प फायर गीत से लेकर रात्रि गान के बीच पूरे 34 साथियों ने आज अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए कुछ ना कुछ प्रस्तुति दी और सभी ने खूब आनंद उठाया।कई साथियों की प्रतिभा का आज पता चला।लगभग ढाई घंटे चला यह कैम्प फायर हमेशा याद रहेगा एक सुखद स्मृति के रूप में हम सबको।
एक्सपीडिशन के स्नेहिल साथीगण:-
श्रीमती जया श्री राजीव जी अग्रवाल
श्रीमती सविता श्री रवि जी गुप्ता
श्रीमती ऋतु श्री राजेश जी अग्रवाल
श्रीमती शिखा श्री विजय जी बियाणी
श्रीमती जास्मिन श्री संजय जी कोठारी
श्रीमती मनीषा श्री प्रताप जी दुबे
श्रीमती ज्योति श्री दीपक जी कोठारी
श्रीमती शीतल श्री पारस जी जैन
श्रीमती मंजू श्री महेश जी पोरवाल
श्रीमती अंजना श्री प्रमोद जी फरक्या
श्रीमती सविता श्री कृष्णकांत जी मुजावदिया
श्रीमती नेहा श्री भारत जी शर्मा
श्रीमती सोनल श्री सुनील जी चौहान
श्री बालेश जी चौरसिया
श्री किशन जी थावरानी
श्री अक्षय जी होल्कर
श्री संजय जी गोयल
श्री अंकुर जी साहू
श्री निकुंज जी गोयल
श्रीमती स्मिता श्री कुणाल जी मिश्र
पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों😀








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