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नार्थ ईस्ट बाइक एक्सपीडिशन ♥️(2)
मेघालय याने मेघों का आलय याने बादलों का घर....
रसीले रसीले पाइनापल...अरे वाह
अरे यार फ्रूट्स बहुत जोरदार दिख रहे हैं, करके हमारा काफिला रुक गया सुबह सुबह गुवाहाटी से लगभग 30 किलोमीटर चलकर।पाइनापल, केले,तरबूज,छोटे सेवफल जैसे बड़े बड़े बैर जम के सूते।पाइनापल तो गज़ब के रसीले थे,मजा आ गया।
उमियम नदी:::बोटिंग और सेना का अभ्यास .....
पहला पड़ाव था रास्ते में पढ़ने वाली विशाल उमियम नदी।नदी के एक किनारे बहुत ही खूबसूरत गार्डन डेवलप किया गया था और वहां मशीन मोटर बोट से घुमाने की व्यवस्था थी।10-10 के पांच ग्रुपों में हम सभी ने भी मस्त बोटिंग की। यहां एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला, सेना का एक हेलिकॉप्टर बिल्कुल नदी के ऊपर बहुत नीचे तक आकर एक छोटी बोट और फिर 8 सैनिकों को नीचे टपकाता है और फिर वे सैनिक तैरकर उस बोट के पास पहुंचते हैं।सेना के इस अभ्यास को बहुत से लोगों ने अपने कैमरे में कैद किया।
बॉटनिकल गार्डन में मजा....
शिलांग होटल चेक इन कर लोकल साइट सीन पर निकले तो पता चला आज मंगलवार है और सब कुछ बंद है।पास ही एक बॉटनिकल गार्डन था तो 2 घंटे का समय वहां व्यतीत किया।गाने गाए, डांस किया और बचपन के मित्र प्रोफेसर विपुलकीर्ति
शर्मा से मकड़ियों के बारे में रोचक जानकारी प्राप्त की।
तंबोला....तंबोला...तंबोला
आज समय था तो होटल पर तंबोला खेला, तम्बोले में अंग्रेजी शब्द बोलने पर 10 रुपए की पेनल्टी थी, बहुत आनंद आया।60 बार लोगों ने अंग्रेजी शब्द बोले और 600 रुपए पेनल्टी के इकट्ठे हुए।हंस हंस कर पेट दुख गया।
शादी करके लड़के जाते हैं लड़की के घर....
यहां मेघालय में यहां के समाज के बारे में कई रोचक जानकारियां प्राप्त हुई।जैसे भारत के अन्य राज्यों से अलग यहाँ मातृवंशीय प्रणाली चलती है, जिसमें वंशावली माँ (महिला) के नाम से चलती है और सबसे छोटी बेटी अपने माता पिता की देखभाल करती है तथा उसे ही उनकी सारी संपत्ति मिलती है।लड़के शादी होकर लड़की के यहां आते हैं।
एलीफेंट फॉल....
अगले दिन चेरापूंजी भ्रमण था।सबसे पहले पहुंचे एलीफेंट फॉल।चार सीडी उतरे तो खासी ड्रेस का स्टाल था, बस फिर क्या था पूरे 47 लोग उस स्टाल पर थे और आज संवर रहे थे।करीब 1 घंटे चला इस ड्रेस का फोटो सेशन,आनंद आ गया।
एलिफेंट जलप्रपात तीन स्तरों में गिरता है, जिन्हें देखने से ऐसा लगता है कि यह जलप्रपात अलग-अलग चरणों में विभाजित हो गया हो। प्रत्येक चरण में पानी की धारा अलग-अलग दिशा में गिरती है, जिससे यह जलप्रपात और भी आकर्षक और दृश्यात्मक रूप से दिलचस्प बनता है। जलप्रपात के आसपास की पहाड़ियाँ, शांत वातावरण, सुंदर सुंदर दृश्य और घने जंगल इस स्थान की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे। कई लोग नीचे तक होकर आए तो अधिकांश दूसरे फाल तक ही गए।
रास्ते में मावकडोक डिम्पेप घाटी विव पॉइंट पर चाय के लिए रुके।मनीष भाई ने चाय बनाने की जिम्मेदारी लेकर शानदार चाय पिलवाई सभी को।यह घाटी मेघालय की सबसे प्रसिद्ध घाटियों में से एक है , जो धुंध भरी पहाड़ियों और हरे-भरे लाखों वृक्षों से घिरी हुई है। शांतिपूर्ण परिदृश्यों का आनंद लेते हुए जमकर इस घटी के सौंदर्य को कैद किया सभी ने अपने मोबाइल में।यहां घाटी में ज़िप-लाइनिंग भी हो रही थी पर समयाभाव के कारण हम उसका आनंद नहीं ले पाए।
अरवाह गुफा....
अरवाह गुफाएं मेघालय के चेरापूंजी जिसे यहां के लोग सोहरा कहते हैं, के पास पूर्वी खासी पहाड़ियों में स्थित हैं, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण प्रसिद्ध है।
यहां तक पहुंचने के लिए हम लोगों ने लॉ शाइना जंगल से होकर 15-20 मिनट की पैदल यात्रा की।गुफा तक जाने वाला मार्ग बहुत ही खूबसूरत था।आसपास की घाटियों, झरनों और हरियाली का अद्भुत दृश्य मन को सुखद एहसास दे रहा था।
एक गाइड को लेकर हम लोगों ने चुना पत्थर से बनी इन गुफाओं में प्रवेश किया।गाइड ने हमें गुफा की दीवारों में लगे समुद्री जीवन के जीवाश्म शंख, मछली की हड्डियां और क्रस्टेशियन के दिखाएं और बताया कि ये लाखों साल पुराने हैं और इससे यह पता चलता है कि यह क्षेत्र कभी पानी के नीचे था।
गुफा के बीच से एक छोटी भूमिगत जलधारा बह रही थी जिसका पानी गुफा में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहा था।कुल मिलाकर इस गुफा को देखना एक शानदार अनुभव रहा।
मावसमाई गुफा और जिंदादिल चौक ....
यहां से हम पहुंचे मावसमाई गुफा।पार्किंग से गुफा तक पहुंचने के रास्ते में एक बेहद दिलचस्प दृश्य उपस्थित था।बिल्कुल चौक में सड़क के बीचों बीच फूल वॉल्यूम के साथ गायक कलाकार गीत गा रहे थे और पर्यटक डांस कर रहे थे। मैं वहीं खड़ा हो गया मुझे मालूम था कि अब क्या होने वाला है, अपने वाले भी सब नाचने को तैयार,बड़ी मुश्किल से सबको पहले गुफा की ओर भेजा।दुकानदार को 30 मेगी बनाने का आर्डर दिया कि हम गुफा देखकर आते हैं, नाचते गाते तुम्हारी मेगी का आनंद लेंगे।
यह मावसमाई गुफा तो पिछली वाली से भी अधिक लुभावनी थी।अंदर कई बांके, टेढ़े, संकरे, छोटे रास्तों के बीच सिर झुकाकर, कई जगह रेंगकर जाना पड़ रहा था।
जैसे ही हम गुफा में प्रवेश किए तो हम गुफा की दीवारों, छत और फर्श पर सजी संरचनाओं की विविधता और सुंदरता को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। हम छत से लटकने वाली, फर्श से ऊपर उठने वाली, कई तरह की डिजाइन वाले खंभे और पर्दे जैसी दिखने वाली कलाकृतियों को देख कुदरत के चमत्कार के प्रति नतमस्तक थे।प्राचीन जानवरों और पौधों के जीवाश्म भी बड़ी संख्या में देखने को मिले।हर आकृति का अपना आकार, रंग और बनावट थी, जो एक आश्चर्यजनक दृश्य प्रभाव पैदा कर रही थी।खैर आकृतियां चमक रही थी तो कुछ में से पानी टपक रहा था।
इन गुफाओं को देख हम चौक में थे और हमारे साथ थे स्थानीय गायक कलाकार अपने बैंड के साथ। हमें आता देख बेहतरीन वाले डांसिंग हिंदी गाने गाना शुरू कर दिए और हम सब तो जैसे नाचने थिरकने को उधार ही बैठे थे।खूब नाचे और गरम गरम मेगी का आनंद इंदौर से साथ लाए थेपलों अचार के साथ लिया,आज यही हमारा लंच था।
इको पॉइंट पर प्रकृति के नजारे निहारते, वहां लगे झूले फिसलपट्टी, चकरी और सी सा का बच्चों समान आनंद लेते वापसी शिलांग की ओर निकल पड़े।
धन्यवाद मोदी सरकार....
आज पूरे रास्ते मौसम बहुत शानदार मिला इसलिए मोटरसाइकिल का सफर भी शानदार रहा, बस रास्ते को लेकर थोड़ी समस्या रही कि पूरे रास्ते को 4 लेन बनाने के लिए जोरदार दिन रात काम चल रहा था।तारीफ की हकदार है मोदी सरकार।
पेड़ की जड़ों से बना पुल नहीं है किसी करिश्मे से कम!
दुनिया में ऐसे बहुत से पुल हैं जिसे इंसानों ने बनाया है. उनकी खूबसूरती की लोग तारीफ भी बहुत करते हैं और इन पुलों से ही कई शहर या देश जाने जाते हैं. सिडनी का हार्बर ब्रिज हो या टावर ब्रिज, दुनिया में इनकी अलग पहचान है.
मेघालय में स्थित बेहद अनोखा जड़ों सा बना पुल (Living Root Bridges in Meghalaya) आज भी उतनी मजबूती से टिका हुआ है जितना तब था जब उसे बनाया गया था. रिपोर्ट्स की मानें तो ये पुल 180 साल से भी ज्यादा पुराना है. इसकी खासियत ये है कि ये पुल पेड़ों की जिंदा जड़ों से धागे की तरह बुनकर बनाया गया है।आप सोचेंगे कि इस अद्भुत पुल को बनाने में काफी प्रशिक्षित इंजिनीयर्स का दिमाग लगा होगा, पर आप गलत हैं। मेघालय में लंबे वक्त से खासी और जयंतिया जनजाति (Khasi and Jayantia Tribes) के लोगों ने इस पुल का निर्माण किया था।
ब्रिज पर 50 लोग तक आराम से चल सकते हैं स्थानीय खासी और जयंतिया जनजाति के लोगों ने पेड़ की जड़ों से पुल बनाने की हुनर में महारत हासिल कर ली है। इस जनजाति के लोगों ने ही इस पुल को कई सौ साल पहले अपने हाथों से बनाया था।आज भी पुल वैसे ही टिका है और इसपर एक साथ 50 लोग तक आराम से चल सकते हैं।ये पुल मेघालय के घने जंगलों से गुजरने वाली नदी के ठीक ऊपर बनाया गया है जिससे नदी पार करने में आसानी हो।
बाद में गूगल माता से जानकारी मिली कि लिविंग रूट ब्रिज, रबर के पेड़ की जड़ों से बना है. जिन्हें Ficus elastica tree कहा जाता है। इन पुलों में कुछ का साइज 100 फीट तक है और इन्हें सही शेप लेने में 10 से 15 साल का वक्त लगता है. जब ये जड़ें पूरी तरह से बढ़ जाती हैं तो ये 500 सालों तक मजबूती से बनी रह सकती हैं। कई जड़ें पानी से लगातार मिलते-मिलते सड़ने लगती हैं मगर नई जड़ें पैदा होती जाती हैं।
कई कई बार चलकर देखा हम सब ने इस अनोखे पुल पर।सलाम स्थानीय जनजातियों की इस जिजीविषा और हुनरमंदी को🙏
भारत की सबसे साफ नदी....
आज अब हम सभी जा रहे थे एक ऐसी नदी की ओर जिसका पानी क्रिस्टल क्लियक है. इस नदी का नाम उमंगोट नदी है जिसे डॉकी झील भी कहा जाता ह।. यह नदी काफी सुंदर, शांत और एकदम साफ है।डॉकी मेघालय में भारत-बांग्लादेश सीमा पर एक छोटा सा शहर है। ऐसा बताते हैं कि इस नदी का पानी इतना साफ है कि नौकाएं हवा में तैरती प्रतीत होती हैं।
किनारे तो वाकई इतने ही क्रिस्टल क्लियर थे, पर जैसे जैसे नौका आगे बढ़ती गई नीचे दिखाई देना बंद हो गया था।पर कुछ भी कहें नौका विहार का आनंद आता है डॉकी रिवर में।बांग्लादेश बार्डर 10 फीट की दूरी पर थी यहां बस।सैफ अली खान पर हमला करने वाला बांग्लादेशी बताते हैं इसी बार्डर को आसानी से पार कर भारत आया था।हम जब भोजन कर रहे थे तब एक महिला भागती हुई भीड़ में गुम हो गई, पता नहीं बांग्लादेश से आई थी क्या?
"स्वच्छ शहर से स्वच्छ गांव तक:::इंदौर से मौलिन्नोंग तक"
यहां से नजदीक है एशिया का सबसे स्वच्छ गांव का तमगा प्राप्त करने वाला गांव मौलिन्नोंग गांव(Mawlynnong Village)।
स्वच्छता में रुचि रखने वाले, अपनी आदतों को सुधारकर भारत भर में विगत सात बार से सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल करने वाले हम इंदौरियों को सबसे स्वच्छ गांव में रुचि होना स्वाभाविक था।
वाकई पूरा गांव बहुत ही साफ सुथरा था, हर घर के आगे एक बांस की टोकरीनुमा कचरा पेटी टंगी थी।कचरे का निस्तारण गांव वाले खुद करते हैं।प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करते हैं।हर गली में पत्थर के पेबल्स
लगे थे।खूब खूब हरा भरा था यह गांव।काश भारत के सब गांव शहर के बाशिंदे अपना इस कदर ध्यान रखने लगे तो भारत स्वर्ग बन जाए।बहुत ही सुखद अनुभूति हो रही थी इस गांव की गलियों और सड़कों पर घूमने पर।
हमने सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा गीत गाते हुए एक जुलूस निकाला और गांव के चौक में "स्वच्छ शहर से आए है, स्वच्छता का संदेश लाए हैं", "स्वच्छता का सिरमौर:::शहर इंदौर,इंदौर, इंदौर", और "स्वच्छ शहर से स्वच्छ गांव तक:::इंदौर से मौलिन्नोंग तक" के
गगनभेदी नारों से जनता का ध्यान आकर्षित किया।
मेघालय स्काउट हेडक्वार्टर....
आज के दिन की शुरुआत हुई भारत स्काउट एवं गाइड के प्रादेशिक मुख्यालय की विजिट से।मेघालय के पूर्व राज्य संगठनायुक्त स्काउट और वर्तमान में स्पेशल ऑफिसर गैरी जेम्स मेरे मित्र है, तो वे होटल पर नाश्ते पर आए थे और वहीं उन्होंने सभी से आग्रह किया मुख्यालय विजिट का।बहुत ही व्यवस्थित बना हुआ है राज्य मुख्यालय भवन।अगर महिलाएं साथ में नहीं होती तो चार दिन हमारा प्रवास यहां की डॉरमेट्री में होना तय था,ऐसा सभी का मानना था।वहीं गुवाहाटी की लीडर ट्रेनर बहन अन्ना भी मिल गई गैरी और अन्ना जी के साथ फोटो लेकर हम सभी पहुंचे अपर शिलांग।
शिलांग विव पॉइंट.....
अपर शिलांग की शिलांग पीक को देखने के लिए अपनी गाड़ियों को छोड़ प्राइवेट टैक्सियों से सेना कैंपस में जाना और आना होता है,हर व्यक्ति की आई डी चेक की जाती है।महू की तरह सेना का कैंपस बहुत ही शानदार था।यहां से हमें पूरा शिलांग दिखाई दे रहा था।बहुत ही विहंगम दृश्य था, मज़ा आ गया।
शिलांग के इस सबसे ऊंचे पर्वत की ऊंचाई सागर सतह से 1,961 मी॰ (6,434 फीट) है। बहुत से इतिहासकारों की मान्यता अनुसार इसी पर्वत के कारण इस शहर का नाम शिलांग पड़ा। यहां के स्थानीय जनजातीय खासी लोगों की मान्यता है कि उनके देवता लीशिलांग इस पर्वत पर रहते हैं और वे पूरे शहर पर नजर रखते हैं और लोगों को हर तरह की मुसीबतों से बचाते हैं।
यहां से एयरफोर्स म्यूजियम गए पर धुलेंडी होने के कारण उसे देख नहीं पाए, बंद था म्यूजियम।
पवित्र वन....
फिर हम पहुंचे "पवित्र वन"
हर 12 लोगों पर एक गाइड के माध्यम से हमने इस पवित्र जंगल को महसूस किया और यह जाना कि
सदियों से खासी रीति-रिवाज और परंपराएं भूमि और जंगलों में समाहित हैं। इनमें से एक जंगल आज भी अपना महत्व बनाए हुए है - मावफ़्लांग के पवित्र ग्रोव। आगंतुकों को इस पवित्र जंगल से कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं है, यहां तक कि एक कंकड़ या टहनी भी नहीं।
दुर्लभ पौधों, मशरूम और पेड़ों के अलावा, यह जंगल पुराने राज्याभिषेक और बलिदान स्थलों का भी घर है। यहीं पर खासी राजाओं और औपचारिक नेताओं (की लिंगदोह) की बैठकें होती थीं और नए प्रमुखों का अभिषेक यहीं होता था। इन स्थलों पर मोनोलिथ लगे हैं, जो आज भी एक गरिमापूर्ण अतीत की याद दिलाते हैं।
आज के शेष बच रहे समय का सदुपयोग पूर्व निर्धारित कार्यक्रम अनुसार महिलाओं ने शिलांग के बाजार से जमकर शॉपिंग कर किया।शाल, हस्तकला की वस्तुएं, बेग इत्यादि सबने खरीदे।
इतना बड़ा ग्रुप, भांति भांति के साथीगण, सबका अपना व्यवहार पर सब मजा मौज और मस्ती करने वाले, कोई टेंशन देने वाला नही अपितु सब आगे बढ़कर काम की जिम्मेदारी सम्हालने वाले, समयबद्धता का पालन करने वाले, एक दूसरे का ध्यान रखने वाले और खूब ठहाके लगाने वाले।सच कहूं तो सौभाग्यशाली महसूस करता हूं अपनेबापको विजयन ग्रुप के इतने स्नेहिल और परवाह करनेवाले मित्रों के बीच अपने को पाकर और धन्यवाद ज्ञापित करता हूं परम पिता परमेश्वर को उसकी महती कृपादृष्टि के लिए🙏
दास्तां अभी बाकी है.....
इस बाइक एक्सपीडिशन में शामिल विजयंत ग्रुप के साथीगण:
श्रीमती मंजू संग श्री अशोक जी खासगीवाल
श्रीमती किरण संग श्री ललित जी कोटिया
श्रीमती संगीता संग श्री गोपाल जी दरियानी
श्रीमती जया संग श्री राजीव जी अग्रवाल
श्रीमती सविता संग श्री रवि जी गुप्ता
श्रीमती निशा संग श्री रमेश जी प्रजापत
श्रीमती ऋतु संग श्री राजेश जी अग्रवाल
श्रीमती जास्मिन संग श्री संजय जी कोठारी
श्रीमती रश्मि संग श्री संजय जी गोयल
श्रीमती रिया संग श्री मुकेश जी राजानी
श्रीमती शिखा संग श्री विजय जी बियानी
श्रीमती श्वेता संग श्री मनीष जी जैन
श्रीमती कीर्ति संग श्री संदीपन जी आर्य
श्रीमती जयश्री संग श्री तरुण जी मिश्र
श्रीमती सुमन श्री जितेंद्र जी जैन
श्रीमती काजल संग श्री गोपाल जी ज्ञानचंदानी
श्रीमती तरूणा संग श्री अक्षय जी होलकर
श्रीमती सोनल संग श्री सुनील जी चौहान
श्रीमती मीनाक्षी संग श्री सुमित जी बाबेल
श्री जितेंद्र जी कोचर
श्री विपुल कीर्ति जी शर्मा
श्री भारत जी शर्मा
श्री अंकुर जी साहू
श्री मुकेश जी शर्मा
श्री संजय जी गोस्वामी
श्री पंकज जी कोचर
श्रीमती स्मिता संग श्री कुणाल मिश्र










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