रिमझिम बारिश में मोटरबाइक पर 14 घंटे....

 


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रिमझिम बारिश में मोटरबाइक पर 14 घंटे....
विजयंत एडवेंचर ग्रुप के 23 साथी रविवार सुबह 6.30 पर जब ग्रुप गतिविधी स्थल परसरामपुरिया एकेडमी पर एकत्रित हुए तो मौसम बड़ा ही खुशगवार था। एक दूसरे से परिचय प्राप्त कर पोहे का आनंद ले मोटरबाइक्स पर सवार यह काफिला निकल पड़ा मानसून यायावरी के लिए।
भंवरीलाल महू पर जो साथी पहुंचे उन्होंने बताया कि भंवरीलाल तो 8 बजे खुलेगा तो रास्ते में बाबा राऊ से कचोरी ली और भंवरीलाल के सामने उदरस्थ की।
होलकर कालीन मालवा निमाड़ के संधी स्थल पर बनी चौकी जो जामगेट कहलाती है पहुंचे तो सावन की फुहारे हमारा स्वागत कर रही थी।बादल आसमान में अटखेलियां कर रहे थे और हम यहां जमीन पर।खूब फोटो निकाले और आगे बड़े सोयाबीन के खेत छोड़ कपास के खेतों के क्षेत्र की ओर। खेतों में लहलहाती समृद्धि दिल को मोह रही थी।
जामगेट घाट नीचे उतरते उतरते कई लोग दौड़ते दिख रहे थे, मैं और श्रीकांत जी चर्चा कर जी रहे थे कि कुछ मैराथन वगैरह या उसकी प्रेक्टिस चल रही है, नीचे घाट की तलहटी पर 15-20 लोग एकत्रित हो सुस्ताते दिखे तो रुककर उन्हें बधाई देने लगे तो देखा भाई प्रियव्रत शाह और सोनिया भाभी का दशहरा मैदान ग्रुप एकत्रित है।खूब लंबी लंबी दूरी की साइकलिंग की है प्रियव्रत भाई के साथ मैने और वे सुखद स्मृतियां आज भी मनो मस्तिष्क में ताजी हैं।प्रियव्रत भाई ने बताया कि कुछ लोगों ने 16 तो कुछ ने 21 किलोमीटर की दौड़ आज पहाड़ी पर लगाई है।उनकी जिजीविषा को सलाम कर बधाइयां देते हुए दोनों ग्रुप ने एकत्रित हो एक फोटो खिंचवाया और वहां से विदाई ली।
अगला पड़ाव था चोली गांव।मनीष भाई का कल रात फोन आया था कि सर मेरे एक मित्र हैं सुशील जी अजमेरा और उन्होंने मंडलेश्वर के पास चोली गांव में 25 बीघा पथरीली जमीन में आर्गेनिक खेती करते हुए उसे हरा भरा कर दिया है, आप अगर इजाज़त दो तो उनसे सुबह चाय पर वहां मुलाकात करते हैं।समय की जोड़ बाकी लगाकर मैंने सहमति प्रदर्शित की तो मनीष भाई ने सुशील जी को आग्रह किया तो सुशील भाई इंदौर से हमसे भी पहले निकलकर चोली अपने फार्म हाउस पर हमारे स्वागत के लिए मौजूद थे।
अद्भुत व्यक्तित्व के धनी है सुशील भाई। प्रसिद्ध विचारक प्रखर वक्ता और एक्टिविस्ट भाई राजीव दीक्षित के साथ पूरे भारत में भ्रमण किया और कार्य किए हुए सुशील भाई मूलत दक्षिण भारत के रहने वाले हैं और ग्रेनाइट माइंस का व्यवसाय करते हैं।एक शानदार गौशाला भी उन्होंने बना रखी हैं,जहां की हिंदुस्तान भर की प्रजातियों को गायों और बैलों से सुशील भाई ने सभी का परिचय करवाया।गाय के गोबर और मूत्र के खेती में आश्चर्यजनक परिणामों पर आपने चर्चा की।कैसे उन्होंने एक बंजर पथरीली पहाड़ी को आर्गेनिक खेती करते हुए हरी भरी पहाड़ी में तब्दील कर दिया यह बताया। इंदौर में 1000 घरों की छत पर सब्जी और फल उगवाने के अपने संकल्प के बारे में भी विस्तार से बताते हुए हमारी पूरी टीम को अपने घरों पर सब्जी लगाने के लिए प्रोत्साहित किया और अपनी मदद की पेशकश की। विजयंत ग्रुप उनके अनुभवों का लाभ लेने के लिए शीघ्र ही इंदौर में अपने इच्छुक सदस्यों के लिए एक कार्यशाला का आयोजन रखेगा,यह तय किया गया।बड़े ही स्नेह के साथ हमें चाय-कॉफी पिलवाई और पकौड़िया खिलवाई।उन्होंने हमारे ग्रुप के लिए वृक्षारोपण के कार्यक्रम की भी तैयारी की हुई थी। चोली में उनके फार्म की विजिट को चिरस्थाई बनाने के उद्देश्य से हम सभी ने पौधारोपण किया और सुशील भाई को उनकी अद्भुत कार्यशिलता और लगन के लिए हर्षनाद ज्ञापित करते हुए हम चोली से अपने अगले लक्ष्य सियाराम बाबा के आश्रम के लिए निकल चले।धन्यवाद मनीष भाई सुशील जी से उनके कार्यों से पूरे ग्रुप को रूबरू कराने के लिए🙏
भारत भूमि साधु-संतों की तपस्थली के रूप में जानी जाती है। आम जनता के लिए ये तप स्थल ही तीर्थ बन जाते हैं। ऐसे ही एक संत हैं भटयाण के सियाराम बाबा। सियाराम बाबा के बारे में कहा जाता है कि उनकी उम्र 108 साल से भी अधिक है और वे रोजाना 21 घंटे रामायण का पाठ करते थे। बिना चश्मे के वे रामायण की चौपाइयों को पढ़ते हैं।
संत सियाराम बाबा का आश्रम मध्यप्रदेश में खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर भट्यान गांव में नर्मदा किनारे स्थित है। गांव के लोग बाबा से जुड़ी कई चमत्कारिक घटनाएं बताते हैं। श्रद्धालु बताते हैं कि बाबा ने 10 सालों तक खड़े होकर तप किया था।
12 वर्ष मौन के बाद पहला शब्द बोले "सियाराम" तो उन्हें मिला यही नाम ..!
बाबा के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु नर्मदा किनारे स्थित इस गांव में आते हैं। उनके नाम से ही गांव प्रसिद्ध हो चुका है। सियाराम बाबा की जर्जर हो चुकी काया देखकर उनकी उम्र का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
चोली से मंडलेश्वर होते हुए जब हम गोगावा गांव पर पहुंचे तो कई सारे श्रद्धालु वहां पर नर्मदा नदी को पार कर आश्रम जाने के लिए पहले से मौजूद थे। तीन किश्तों में चार-चार मोटरसाइकिल और उनके साथ हम लोग, साथ में थोड़े से ग्रामीण जन नर्मदा नदी को नांव से पार कर भट्याण पहुंचे जय सियाराम बाबा के आश्रम में।हम तो कई बार इस तरह नर्मदा नदी और समुद्र में छोटी बड़ी नावों में मोटरसाइकिलें यहां तक कि कारें भी रखकर सफर कर चुके थे पर कई साथी इस रोमांच को पहली बार महसूस कर आनंदित और आश्चरचकित हो रहे थे।
सैकड़ो लोग आश्रम पर दर्शन के लिए लाइन में लगे हुए थे बाबा के दर्शन के लिए। हमने भी बाबा के दर्शन किए उनसे आशीर्वाद लिया और बाबा के हाथ से चना चिरौंजी का प्रसाद ग्रहण किया । कुछ पैसे देने लगे तो ₹10 एक व्यक्ति से रखकर बाकी पैसे वापस वहां पर हो जाते थे। ₹10 से ज्यादा बाबा किसी से लेते नहीं है।बताते हैं कि बाबा ने नर्मदा घाट की मरम्मत और बारिश से बचने के लिए नांगल वाड़ी में शेड बनवाने के लिए 2 करोड़ 57 लाख रुपए दान में दिए हैं, ये पैसा उन्हें आश्रम की डूब के मुआवज़े के रूप में दिया गया था।नर्मदा परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूरे समय बाबा के यहां भंडारा अनवरत चलता रहता है उनकी खूब सेवा सुश्रुणा बाबा करते हैं।सदाव्रत में नर्मदा परिक्रमावासियो को दाल, चावल, तेल, नमक, मिर्च, कपूर, अगरबत्ती व बत्ती भी देते हैं।कई बार अपने हाथों से चाय बना कर पिलाते हैं। हमें भी वहां के लोगों ने आग्रह किया कि प्रसाद लेकर जाइए तो सुस्वादु खिचड़ी प्रसाद का आनंद लेकर हम लोग आगे बड़े । धन्य हो गए बाबा के दर्शन करके और धन्य थे लोगों की उनके प्रति श्रद्धा और प्यार देखकर।
यहां से 23 किलोमीटर दूर स्थित है रावेर। नर्मदा नदी के किनारे बसा छोटा-सा गांव रावेरखेड़ी, इतिहास और धर्म के पन्नों में अपना विशेष स्थान रखता है। मध्य प्रदेश शासन ने इसकी कुछ सुध ली तो यहां पर पहुंचने के लिए पक्की सड़के बन गई है। वहां लगे जानकारी पत्रक के अनुसार बाजीराव प्रथम (18 अगस्त 1700-28 अप्रैल 1740) एक प्रसिद्ध भारतीय सेनानायक थे, जो 1720 से चतुर्थ मराठा छत्रपति शाहू जी के पेशवा रहे। वे बालाजी विश्वनाथ के पुत्र थे। उन्हें बाजीराव बल्लाल भी कहा जाता था।
भाट वंश के नौ पेशवाओं में सबसे प्रभावशाली बाजीराव ने मराठा राज्य के विस्तार में, विशेषतः उत्तर में, निर्णायक भूमिका निभाई थी। उन्होंने मालवा, गुजरात, निजाम समेत कई दक्षिणी राज्य, पुर्तगालियों तथा दिल्ली के सुल्तान की सेनाओं को मात दी थी। गुजरात के गायकवाड़, ग्वालियर के शिंदे (सिंधिया), नागपुर के भोंसले, धार के पंवार तथा इंदौर के होलकर को अधीन कर उन्होंने मराठा संघ का गठन किया था।
उत्तर भारत में एक अभियान के दौरान एक लाख सैनिकों के साथ पश्चिम निमाड़ में नर्मदा तट पर डेरा डाले थे, उसी दौरान ग्रीष्माघात (लू लगने) से 28 अप्रैल 1740 को 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, उनकी अंत्येष्टि 28 अप्रैल 1740 को नर्मदा तट पर रावेरखेड़ी में की गई थी। उनके वफादार सरदार, ग्वालियर के सिंधिया, ने यहाँ उनकी समाधि बनवाई।
मेरा तीसरी बार यहां आना हुआ सड़कों को छोड़ समाधी की स्थिती वैसी ही है।
कई साथी पहले मेरे साथ यहां आ चुके थे तो कई पहली बार इस स्थान को देख रहे थे।
कुछ समय गुजारकर हम यहां से सनावद होते हुए बड़वाह पंचवटी पहुंचे जहां सुस्वादिष्ट भोजन कर सुखद स्मृतियों के साथ इंदौर वापस लौटे।
बहुत समय बाद ऐसा हुआ कि लगभग 14 घंटे सावन की रिमझिम कभी तेज तो कभी धीमी बारिश में भीगते रहे। अब नाजुक शरीर पर इसका क्या प्रभाव होगा यह तो 2-3 दिनों में पता चलेगा पर आज का दिन तो बहुत ही आनंददायक रहा।
आज की इस मोटरबाइक एक्सपीडिशन में शामिल विजयंत ग्रुप के स्नेहिल साथीगण:-
रमेश जी प्रजापत
बालेश की चौरसिया
भारत जी शर्मा
प्रमोद जी पहाड़िया
गोपाल जी दरयानी
मुकेश जी शर्मा
मितेश जी सिंगी
मनीष जी जैन
कृष्णकांतजी मुजावदिया
लकी जी सोनी
प्रताप जी दुबे
सुमित जी बाबेल
अंकुर जी सोनी
आकाश जी नैयर
किशन जी थावरानी
जितेंद्र जी जैन
अजय जी तिवारी
गिरिराज जी गुप्ता
डॉक्टर वीरेंद्र जी वैष्णव
महेश जी पोरवाल
हेमन्त जी वर्मा
श्रीकांत जी कलमकर
कुणाल जी मिश्र

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